Mr. Writer & Madam Mysterious : Part - 2 (Love Story )

 Welcome to my story blog!

This is the beginning of an original Hindi love story, titled:

Mr. Writer & Madam Mysterious  (मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस )

Told in weekly parts, this story explores quiet heartbreak, unspoken love, and the kind of connection that lingers even after it’s gone.

If you’ve ever loved deeply — or lost without closure — I hope this story finds you.

You can read part one here: Part 1

This is Part Two. Thank you for reading, and feel free to share your thoughts in the comments.


मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस

भाग 2 : बचपन की स्मृतियाँ और गाँव की ओर यात्रा

समय किसी के लिए नहीं रुकता। देखते ही देखते दीपक भी बड़ा होने लगा। जब वह सात वर्ष का हुआ, तब उसके माता-पिता ने उसका दाखिला बोरीवली के एक निकटवर्ती हिंदी माध्यम के विद्यालय में करा दिया। उन दिनों हिंदी माध्यम के विद्यालयों में अंग्रेज़ी माध्यम की तरह नर्सरी, एल.के.जी. और यू.के.जी. जैसी कक्षाओं का प्रचलन नहीं था। छोटे बच्चे पहले आँगनवाड़ी जाया करते थे और जब घरवालों को लगता कि अब बालक विद्यालय जाने योग्य हो गया है, तभी उसका प्रवेश कराया जाता था।

दीपक पढ़ाई में आरंभ से ही तेज था। इसका सबसे बड़ा श्रेय उसकी बड़ी बहन रेखा को जाता था। रेखा दीदी घर पर ही उसे बड़े धैर्य और प्रेम से पढ़ाती थीं। परिणाम यह हुआ कि वह अपनी कक्षा के बच्चों से कहीं कठिन प्रश्न भी सहजता से हल कर लेता था। विशेषकर गणित उसके लिए किसी खेल से कम न था।



फिर भी विद्यालय में उसका प्रथम या द्वितीय स्थान कभी नहीं आया।

कारण बुद्धि की कमी नहीं, बल्कि संकोच था। प्रश्नों के उत्तर वह मन ही मन जानता था, पर परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका पर अपने विचारों को उतनी स्पष्टता से उतार नहीं पाता था। उसकी कलम जैसे उसके मन का साथ छोड़ देती थी।

गणित में उसके अंक सदैव अच्छे आते, पर अंग्रेज़ी उसके लिए किसी अनजाने भय का नाम थी। उन दिनों हिंदी माध्यम के विद्यालयों में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले अधिकांश अध्यापक स्वयं भी हिंदी में ही पढ़ाते और समझाते थे। अंग्रेज़ी की पुस्तक खुली रहती थी, पर पूरी कक्षा हिंदी में ही चलती थी। ऐसे वातावरण में भाषा से अपनापन कैसे पैदा होता? यही कारण था कि दीपक अंग्रेज़ी से हमेशा थोड़ा घबराया रहता।




अब वर्तमान की ओर लौटते हैं।

आज 15 नवंबर 2022 था। अगले ही सप्ताह रेखा दीदी का विवाह था। उधर मुंबई में राज और आशु अभी तक फँसे हुए थे। दोनों ने हर संभव प्रयास किया। सामान्य टिकट, तत्काल टिकट—जो उपाय सूझा, सब कर डाला; पर भाग्य शायद उनकी परीक्षा लेना चाहता था। कहीं भी स्थान नहीं मिला।

काफी देर तक विचार-विमर्श करने के बाद आशु बोला,

"जो होगा देखा जाएगा... चलो जनरल डिब्बे में चलते हैं।"

राज ने उसकी ओर देखा, फिर मुस्कुराकर बोला,

"दीपक की बहन की शादी है। अब चाहे खड़े-खड़े जाना पड़े, जाएंगे ज़रूर।"

15 नवंबर की रात दोनों ने जनरल डिब्बे की ट्रेन पकड़ ली।



दो दिन का वह सफर किसी परीक्षा से कम न था। कभी थोड़ी-सी जगह मिल जाती तो बैठ जाते, फिर कोई और आ जाता तो उठना पड़ता। नींद आँखों में थी, पर सिर टिकाने की जगह नहीं थी। जैसे-तैसे सफर काटते हुए 17 नवंबर की दोपहर वे जौनपुर पहुँचे।

उस दिन रेखा दीदी की हल्दी की रस्म थी।

लगभग डेढ़ बज रहा था। नवंबर की धूप भी गाँव में दोपहर के समय अपना पूरा तेज दिखाती है। ऊपर से दो दिन का सफर और थकान। दोनों के चेहरे बता रहे थे कि शरीर अब विश्राम माँग रहा है।

जब वे घर पहुँचे, तब दीपक स्वयं स्नान की तैयारी कर रहा था। मित्रों को देखते ही उसने मुस्कुराकर कहा,

"पहले तुम लोग नहा लो, फिर आराम से खाना खाएँगे।"



दीपक के घर में स्नान की दो व्यवस्थाएँ थीं। एक स्नानघर घर के भीतर था और दूसरी एक चौकी, जो घर से थोड़ी दूर खुले स्थान पर बनी थी। गाँव के लगभग सभी पुरुष वहीं बैठकर स्नान करते थे।

पर दीपक बचपन से ही थोड़ा संकोची स्वभाव का था। खुले में स्नान करना उसे कभी अच्छा नहीं लगा।

उसकी माँ उसकी यह आदत खूब जानती थीं। जब भी वह बाहर जाने में हिचकिचाता, माँ मुस्कुराकर छेड़ देतीं—

"क्यों रे! इतना क्या सोचता है? बिटिया है क्या, जो बाहर नहाने में शर्म आती है? जा, छत पर ही नहा ले।"

माँ की बात सुनकर सब हँस पड़ते और दीपक भी मुस्कुरा देता।

उस दिन भी उसने छत पर ही बाल्टियाँ और पानी का सारा इंतज़ाम कर लिया।

यह देखकर आशु ने उत्सुकता से पूछा,

"क्या हम लोग भी ऊपर ही नहाएँगे?"

"हाँ, ऊपर ही," दीपक ने सहज भाव से उत्तर दिया।

बस इतना सुनना था कि आशु के चेहरे पर बच्चे जैसी चमक आ गई। महानगर में पले-बढ़े उसके लिए खुले आसमान के नीचे गाँव की छत पर स्नान करना किसी नए अनुभव से कम नहीं था।

पर राज चुप था।

दीपक ने उसकी ओर देखकर पूछा,

"क्या हुआ? नहाना नहीं है क्या? वैसे भी दो दिन से तुम लोगों ने ठीक से नहाया नहीं। कहीं पानी से डर तो नहीं लगता?"

राज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

"डर की बात नहीं है... लेकिन मैंने कभी इस तरह खुले में नहीं नहाया। थोड़ी शर्म आ रही है।"

इतना सुनते ही दीपक और आशु ठहाका लगाकर हँस पड़े।

दीपक ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,

"अरे पगले! तू आराम से नहा। हम दोनों नीचे चले जाएँगे। किसी को भी ऊपर नहीं आने देंगे।"

राज भी मुस्कुरा दिया और उसकी सारी झिझक धीरे-धीरे दूर हो गई।


17 नवंबर का दिन नहाने, खाने और मेहमानों से मिलने-जुलने में ही बीत गया।

18 और 19 नवंबर विवाह की तैयारियों में ऐसे निकले कि किसी को समय का पता ही नहीं चला। कोई पंडाल सजा रहा था, कोई मेहमानों की व्यवस्था देख रहा था, तो कोई रसोई में हाथ बँटा रहा था।



फिर आ गया 20 नवंबर—रेखा दीदी के विवाह का दिन।

सुबह से ही तीनों मित्र किसी न किसी काम में लगे हुए थे। शाम होते-होते तो हालत यह हो गई कि उन्हें स्वयं हँसी आने लगी।

आशु बोला,

"यार... हम शादी में आए हैं या मजदूरी करने?"

तीनों ज़ोर से हँस पड़े।

रात लगभग नौ बजे बारात आने वाली थी। बारातियों के ठहरने की व्यवस्था पास के विद्यालय में की गई थी और उसका पूरा दायित्व दीपक, राज और आशु ने संभाल रखा था। बारात थोड़ी देर से पहुँची, पर सब कुछ बिना किसी बाधा के संपन्न हो गया।

रातभर विवाह की रस्में चलती रहीं।

ठंडी हवा चल रही थी। तीनों मित्र अलाव के चारों ओर बैठे हाथ सेंकते, चाय पीते और बीच-बीच में एक-दूसरे की खिंचाई करते रहे। कब रात बीत गई, किसी को पता ही नहीं चला।



लगभग तीन बजे वे किसी कोने में जाकर थोड़ी देर के लिए लेट गए।

जब आँख खुली, तब सुबह काफी हो चुकी थी।

विदाई की तैयारी चल रही थी।



तीनों मित्र तुरंत उठे और बिना कुछ कहे सामान गाड़ियों में रखने लगे। दोपहर लगभग बारह बजे रेखा दीदी की विदाई हो गई।

जैसे ही बारात रवाना हुई, घर का वातावरण बदल गया।

जो आँगन रात तक हँसी, गीत और शोर से भरा था, वही अब एकदम शांत था। कुछ ही घंटों में रिश्तेदार भी लौटने लगे। घर में केवल सन्नाटा और बिछड़ने की उदासी रह गई।


21 नवंबर की सुबह तीनों ने स्नान किया, भोजन किया और बरामदे में बैठकर आगे की योजना बनाने लगे।

मुंबई लौटने की ट्रेन 24 नवंबर की थी।

अर्थात उनके पास पूरे तीन दिन थे।

काफी देर सोचने के बाद आशु बोला,

"क्यों न मेरे गाँव चला जाए?"

सबको यह विचार पसंद आया। आशु का गाँव दीपक के गाँव से लगभग आठ-नौ घंटे की दूरी पर था।

निर्णय होते ही तीनों स्टेशन की ओर निकल पड़े। लगभग डेढ़ घंटे बाद वे स्टेशन पहुँच गए।

आशु के गाँव जाने वाली ट्रेन रात आठ बजे थी।

अभी तीन-चार घंटे शेष थे।

समय बिताने के लिए वे कभी प्लेटफ़ॉर्म पर टहलते, कभी यात्रियों को देखते और कभी यूँ ही बातें करते। कुछ देर बाद उन्होंने स्टेशन के बाहर जाकर समोसे खाने का निश्चय किया।

सभी ने पेट भरकर समोसे खाए।

भुगतान करने के लिए जैसे ही आशु ने जेब में हाथ डाला, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

"मोबाइल...!"

वह घबराकर बोला,

"अरे... मेरा मोबाइल तो प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह गया!"

यह सुनते ही तीनों बिना एक पल गंवाए दौड़ पड़े।

साँसें तेज़ थीं और मन में एक ही डर—कहीं मोबाइल किसी के हाथ न लग गया हो।

सौभाग्य से अभी पाँच-दस मिनट ही हुए थे। मोबाइल वहीं बेंच पर रखा मिला, जहाँ वे बैठे थे।

आशु ने राहत की साँस ली और दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा।

"भगवान, आज बचा लिया।"

राज ने तुरंत उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।

"एक दिन अपनी भूलने की आदत से हमें हार्ट अटैक दिला देगा।"

दीपक भी हँसते हुए बोला,

"मोबाइल नहीं भूलता, अपना दिमाग भूल आता है हर जगह।"

तीनों की हँसी फिर से स्टेशन पर गूँज उठी।

उन्हें क्या पता था कि यह यात्रा अब एक ऐसे मोड़ की ओर बढ़ रही थी, जहाँ उनकी ज़िंदगी में एक अनजाना चेहरा दस्तक देने वाला था... और उसी से शुरू होगी "मिस्टर राइटर और मैडम मिस्टीरियस" की असली कहानी।





You can read Part 3 here : Part 3 :

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